2 sher
तेरे जाने का ग़म इतना भी गहरा न था, बस उम्र भर फिर कोई अपना न मिला। मैंने हर शख़्स में ढूँढा है तुझे बिछड़ने के बाद, कोई तुझ-सा तो मिला, कोई मेरा न हुआ।
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तेरे जाने का ग़म इतना भी गहरा न था, बस उम्र भर फिर कोई अपना न मिला। मैंने हर शख़्स में ढूँढा है तुझे बिछड़ने के बाद, कोई तुझ-सा तो मिला, कोई मेरा न हुआ।
बुद्ध ईश्वर नहीं हैं, ईश्वर वह है जिसे बुद्ध ने पाया है। नानक, महावीर, कृष्ण, राम, ओशो, अल्लाह, ईसा—ये ईश्वर नहीं हैं; इन्होंने जिसे पाया है, वही ईश्वर है। ये इसलिए महान हुए क्योंकि ये उस सत्य तक पहुँचे, जिसे पाने की चाहत लोगों में पैदा हुई। लेकिन विडंबना यह है कि लोगों ने उस सत्य को पाने के बजाय उन्हीं लोगों को पाना शुरू कर दिया जिन्होंने सत्य को पाया था। आज हम बुद्ध को खोजते हैं, बुद्ध ने जिसे खोजा उसे नहीं; कृष्ण को पूजते हैं, कृष्ण ने जिसे जाना उसे जानने की कोशिश नहीं करते। शायद हमें व्यक्ति नहीं, उस अनुभव और सत्य की तलाश करनी चाहिए जिसे उन व्यक्तियों ने पाया था।
सबसे अच्छी बातें वो होती हैं जब बातें नहीं होतीं उस वक़्त कोशिश होती है सिर्फ़ एक कोशिश दो धड़कनों को क़रीब से सुनने की धड़कनों से अच्छी बातें कहाँ होती हैं और कोशिश से अच्छा और कुछ होता भी तो नहीं
kuch kahaniya likhi nahi jati , voh to dheere dheere jee jati hai . paanch naam the par kahani ek hii thi koi lafzo se ghar banata tha koi khamoshi ko samajh jata tha koi hansi se gham chhupa leta tha koi ek muskan se housla de jata tha na dosti ne koi hisab maanga na mohabbat ne koi shart rakhi bas wakt ne itna sikhaya - jo dil se apne hote hai voh kahani ke kisi bhi panne par ho kabhi bichadte nahi or jab kabhikoi iss kahani ko padhega to sirf paanch chehre nahi dikhenge..... voh ek aisa rishta mahsoos karenge jo lafzo se nahi ehsaas se likha gaya tha.......
मैं चाहती हूँ तेरे साथ जीना हर मौसम, हर बदलता रंग जब धूप भी ढल जाएगी शाम में तेरे बाल जब सफ़ेद होंगे मैं उनमें हाथ फेरूँगी ठीक वैसे जैसे पहली बार हम मिले थे और झुर्रियों की हर लकीर में कहानी होगी हमारे बीते हुए दिनों की जब कभी थक जाऊँगी मैं तुझसे हक़ से कहूँगी मैं एक कप कॉफ़ी बना दो उस कॉफ़ी के कप में तेरी छुअन और शक़्कर से लेकर मेरे होठों तक सिर्फ़ प्रेम और ख़ुशी होगी इतनी ख़ुशी कि वो मुझे दुनिया की आख़िरी ख़ुशी लगेगी लोग ढूँढते हैं ख़ुशी दुनिया में कहीं मुझे बस तेरा होना काफ़ी होगा उस वक़्त भी
इस शोर भरी दुनिया में एक शख़्स है जिसके कंधे पर, कुछ वक़्त के लिए ही सही, सर टिकाकर लगता है पूरी दुनिया शांत है एक हिम्मत सी मिलती है और फिर धीरे धीरे मैं उसके दिल के पास जाती हूँ इसलिए नहीं कि उसके दिल में रहना है मुझे बल्कि इसलिए इस दुनिया की गंदी नज़रों से मैं छुपा सकूँ ख़ुद को वहाँ बस एक शख़्स है जिसका हर वक़्त मुझे वो बायाँ हाथ बहुत भाता है
जब जब तुझे शीशे के उस पार देखती हूँ मैं खुद को बस बेबस सा महसूस करती हूँ मैं कभी लगे जैसे इक क़ैदी हूँ मैं यहाँ जो सिर्फ आँखों से कर सकती है प्यार तुझे और कभी कभी ये आँखें थक जाती हैं इंतज़ार में उस वक़्त सोचती हूँ मैं, ये हाथ शायद इसलिए बनाए गए हैं कि कभी तो तुझे छूकर भी महसूस कर सकूँगी मैं जब जब तुझे शीशे के उस पार देखती हूँ मैं खुद को बस बेबस सा महसूस करती हूँ मैं
तुम जाओ अगर कभी, तो जाते-जाते कोई वजह देकर जाना। क्योंकि बिना वजह कोई भी आगे नहीं बढ़ पाता। तुम जानते हो ना, किसी एक इंसान पर बहुत वक़्त तक ठहर जाना कितना दर्द देता है। इसलिए अगर कभी जाना, तो यूँ ख़ामोशी से मत जाना। बस जाते-जाते इतना-सा कर जाना... कोई तो वजह देकर जाना, ताकि मैं खुद को समझा सकूँ, और एक दिन आगे बढ़ सकूँ। क्योंकि जाना तो सब जानते हैं रुक जाना नहीं आता पर जाते-जाते कुछ छोड़ जाना ये हर किसी को नहीं आता बस जाते-जाते इतना-सा कर जाना... कोई तो वजह देकर जाना
तुम प्रेम में कभी फूल न बना तुम बना खुशबू फूल अक्सर मौसम के हिसाब से मुरझा जाते हैं लेकिन खुशबू की खासियत है वो दिखाई नहीं देती फिर बदले फूल का रूप या बदले मौसम खुशबू अपना असर नहीं खोती रूप तो बदल जाते हैं अक्सर लेकिन सच्चे प्रेम की खुशबू कभी नहीं बदलती और तुम मेरे फूल की वो खुशबू हो जिसे मैं कह सकती हूँ ये खुशबू वक़्त के साथ और बढ़ेगी
सभा भरी थी, दीप जले थे, स्वर्णिम था दरबार बड़ा, मखमल पर बैठे थे चेहरे, जिनका था संसार बड़ा। पर उस वैभव की छाती पर एक प्रश्न तलवार बना, एक युवक के सूखे अधरों से उठकर अंगार बना। वह बोला— "क्यों मुझको ही बार-बार यह जग पहचान बताता है? क्यों मेरे हर स्वप्न के आगे कुल का पहरा आता है? मैंने भी तो भोर जगाई, मैंने भी संध्या देखी, मैंने भी माँ की आँखों में आशाओं की गंगा देखी। फिर क्यों मेरे हाथों की रेखाएँ छोटी ठहराई हैं? क्यों मेरे हिस्से की नदियाँ पहले ही सुखवाई हैं? मैंने जब भी ज्ञान माँगा, मुझको सीमा सौंप दी गई, मैंने जब सम्मान माँगा, केवल निंदा दी गई। मेरे भीतर जो सूरज था, उसको ढकने निकले लोग, अपनी छोटी छाया लेकर पर्वत बनने निकले लोग। पर सुन लो, मैं हार मानकर बैठ नहीं सकता पथ में, अग्नि अगर जन्मी है मुझमें, जलना होगा इस रथ में। मुझको रोकोगे तो मेरी प्रतिध्वनि पर्वत चीर उठेगी, एक चिंगारी दबाओगे, सौ-सौ ज्वालाएँ फूटेंगी। मैंने देखा भूखे बच्चे रोटी की ओर निहार रहे, और महल के उत्सव में कुछ चेहरे मद में डूबे थे। मैंने देखा खेतों में श्रम का रक्त पसीना बहता था, और नगर में उसका मूल्य सिक्कों से भी सस्ता था। मुझसे मत पूछो मैं किस कुल का, क्या वंश मेरा कहलाता, पूछो केवल इतना, मुझमें कितना साहस मुस्काता। नदियों का परिचय सागर है, बादल का परिचय वर्षा, मानव का परिचय कर्मों से, बाकी सब तो केवल चर्चा। यदि मिट्टी में शक्ति नहीं तो राजमहल कब बन पाएँगे? यदि श्रमिकों के हाथ रुकें तो उत्सव कैसे आएँगे? जो धरती को अन्न उगाएँ, वे ही भूखे सो जाते हैं, और जिन्हें श्रम का अर्थ न मालूम, वे उपदेश सुनाते हैं। इसलिए आज घोषणा करता हूँ सुन ले यह संसार नया— मानव का मस्तक ऊँचा होगा, टूटेगा हर अत्याचार नया। जो अधिकार छिने बैठे हैं, वे अधिकार जगेंगे फिर से, जो सपने घायल बैठे हैं, वे सपने चलेंगे फिर से। मैं आँधी से लड़ जाऊँगा, यदि पथ में दीवार मिले, मैं सागर से भिड़ जाऊँगा, यदि साहिल लाचार मिले। मेरे भीतर बैठा मानव अब और नहीं झुक पाएगा, सत्य भले ही देर करे पर अंततः जीत जाएगा। इतना कहकर वह चुप बैठा, पर शब्द अमर हो जाते हैं, कुछ स्वर केवल स्वर होते हैं, कुछ इतिहास बन जाते हैं। उस दिन भी एक प्रश्न उठा था मानव के सम्मानों पर, और आज भी वह प्रश्न खड़ा है सत्ता के दरबारों पर। जब तक ऊँच-नीच की जंजीरें धरती पर रह जाए
अब मुझे जबलपुर, जबलपुर कम, यादों का शहर ज़्यादा लगता है ऐसा इसलिए कि जो आता है, वो यादें बनाकर जाता है फिर वो सिविल लाइन की चाय शाय बार, जहाँ हम घंटों बातें करते थे या फिर गंजीपुरा की गलियाँ, जहाँ कानों में झुमके पहनकर ये पूछा जाता था, "ये अच्छा लग रहा है या ये" नर्मदा का पानी, जहाँ हम बस पैर डालकर घंटों बैठे रहते थे भेड़ाघाट का धुआंधार जिसको मैं इतना घूरकर देखती थी जैसे धुएं से पानी के उस पार भी कुछ दिखता हो जबलपुर का नाम, यादपुर होना चाहिए
घर वही रहता है, दीवारें वही, दरवाज़े वही, लेकिन एक दिन माँ चली जाती है... और अचानक घर, घर नहीं रहता। रसोई में बर्तन बजते हैं, पर भूख नहीं लगती। आँगन में धूप उतरती है, पर उजाला नहीं होता। लोग कहते हैं समय सब ठीक कर देगा। पर समय कभी माँ नहीं बनता। वर्षों बाद भी जब कोई पूछता है, "घर कब जा रहे हो?" तो आँखें भर आती हैं, क्योंकि अब घर तो है... मगर माँ नहीं। और जहाँ माँ नहीं होती, वहाँ लौटकर जाने को घर नहीं कहते।॥
डर सिर्फ दूरी का नहीं होता डर होता है उन लफ्ज़ों का भी मैं चाहती हूँ कहना कि मैं साथ हूँ तुम्हारे हमेशा लेकिन डर लगता है यह कहते ही कहीं हमारे साथ की उम्र कम न हो जाए डरती हूँ यह कहते ही न जाने ये मेरी पास की दीवारें ये फोन, ये पानी, ये किताबें सब सुन लेंगे और कोई नज़र लगा देगा इस साथ को बस इसीलिए मेरी ज़ुबान तक शब्द आते हैं और वापस मेरे दिल में रह जाते हैं उसे सुरक्षित जगह कोई और लगती नहीं अब मैं ऐसा कुछ नहीं करना चाहती जिससे यह साथ की उम्र कम हो जाए
अगर मैं बिछड़ जाऊ इस अनंत ब्रह्मांड में तुमसे प्रिय, तुम मिलना पुनः मुझसे उसी फूलों से सजे मंडप में प्रिय। जहां हम पहली बार मिले थे, और जोर लेना अपनी सांसों की डोर मुझसे,और फिर जुदा न करना खुद से। अगर तुम मिलो मुझे पुनः तो कहना प्रिय,इस अनंत ब्रह्मांड मेरा प्रेम पर सदा अधिकार तुम्हारा है प्रिय। ये असीम इंतजार तुम्हारे लिए ही था ,ये कहना तुम मुझसे कहना तुम प्रिय। हम मिलते बिछड़ते रहेंगे हर युग में, पर ये प्रेम मेरा अटूट सिर्फ तेरे लिए ही सदा के लिए था , है और रहेगा ये वचन तुमसे है प्रिय।
मेरे पैदा होने से पहले भी दुनिया थी। पेड़ थे, नदियाँ थीं, लोग हँसते थे, लोग मरते थे, आसमान पर उतने ही सितारे थे जितने आज हैं। फिर मैं आया। और अजीब बात ये है कि मेरे आते ही मुझे लगने लगा कि यह दुनिया मेरे बिना अधूरी थी। मैंने हर चीज़ पर अपना नाम लिखना शुरू कर दिया। मेरी किताब, मेरा कमरा, मेरा शहर, मेरा धर्म, मेरा देश, मेरी मोहब्बत, मेरा ख़ुदा... "मेरा" जैसे पूरी कायनात मेरी जेब में रखी हुई कोई चीज़ हो। फिर एक दिन एक कब्रिस्तान के सामने से गुज़रा। वहाँ हज़ारों नाम लिखे थे। हर नाम के नीचे दो तारीख़ें थीं। एक जन्म की, एक मृत्यु की। और उन दो तारीख़ों के बीच एक छोटी-सी रेखा। बस एक रेखा। मैं देर तक उस रेखा को देखता रहा। क्योंकि सारी मोहब्बतें, सारी नफ़रतें, सारी सफलताएँ, सारे सपने, सारी लड़ाइयाँ, आख़िरकार उसी रेखा में बदल गई थीं। उस दिन पहली बार लगा कि शायद इंसान की सबसे बड़ी ग़लती मर जाना नहीं है। शायद उसकी सबसे बड़ी ग़लती ख़ुद को बहुत ज़्यादा गंभीरता से लेना है। हम आते हैं, थोड़ा-सा शोर करते हैं, कुछ रिश्ते बनाते हैं, कुछ सपने तोड़ते हैं, कुछ दिल दुखाते हैं, कुछ आँसू पीते हैं, और फिर चले जाते हैं। जैसे समुद्र की एक लहर ख़ुद को समुद्र समझ बैठे। और सबसे बड़ा रहस्य ये नहीं कि मृत्यु क्या है। सबसे बड़ा रहस्य तो ये है कि इस अनंत ब्रह्मांड में कुछ वर्षों के लिए मुझे "मैं" होने का भ्रम क्यों दिया गया। क्यों? ताकि मैं घर बना सकूँ? नाम कमा सकूँ? या इसलिए कि एक दिन टूटकर समझ सकूँ कि मैं कभी था ही नहीं... मैं तो उसी अनाम अस्तित्व की एक क्षणिक चमक था, जो मेरे जाने के बाद भी वैसे ही चमकता रहेगा। और जब मेरी आख़िरी साँस निकलेगी, शायद मृत्यु मुझसे यही कहे— "जिसे तुम पूरी उम्र 'मैं' कहते रहे, वो कभी था ही नहीं।"
लोग पूछते हैं— प्रेम किसने लिखा था पहली बार? मैं सोचता हूँ, शायद किसी ने नहीं। क्योंकि प्रेम लिखा नहीं जाता, प्रेम वह हाथ है जो कलम को पकड़ लेता है। जिसने पहली बार प्रेम पर लिखा होगा, उसने प्रेम नहीं लिखा होगा, उसने अपनी प्रतीक्षा लिखी होगी, अपने भीतर की रिक्तता, किसी के आने से पहले का सन्नाटा और उसके जाने के बाद की गूँज लिखी होगी। प्रेम कभी शब्द नहीं बनता, शब्द तो केवल उसके वस्त्र हैं। जैसे नदी नक्शे में नहीं बहती, आग पुस्तकों में नहीं जलती, और आकाश किसी चित्र में नहीं समाता, वैसे ही प्रेम कविताओं में नहीं रहता। वह कविताओं के पीछे खड़ा रहता है, अदृश्य, मगर प्रत्येक पंक्ति की धड़कन बनकर। तुम एक शेर पढ़ते हो और वर्षों पुराना कोई चेहरा अचानक लौट आता है। तुम एक पंक्ति पढ़ते हो और भीतर कहीं एक भूला हुआ दर्द जाग उठता है। यह शब्दों की शक्ति नहीं है। यह प्रेम है, जो शब्दों का सहारा लेकर तुम तक पहुँच जाता है। इसलिए मैं यह नहीं कहता कि प्रेम पर लिखा नहीं जा सकता। मैं केवल इतना कहता हूँ जिस दिन प्रेम पूरी तरह लिख दिया जाएगा, उस दिन कविता मर जाएगी। क्योंकि कविता वहीं जन्म लेती है जहाँ कुछ अनकहा रह जाता है। और प्रेम प्रेम शायद वही है जो अंत तक अनकहा रह जाता है।
सुना है आंधियों से बगावत का अब हुनर कर रहे हैं लोग, तभी तो टूटी हुई किश्तियों में भी सफर कर रहे हैं लोग। कहाँ तो तय था कि हर खेत में लहलहाएगी फसलें, यहाँ तो भूख को भी आँसुओं से अब तर कर रहे हैं लोग। बड़ी तरकीब से थमाया गया था हमें आज़ादी का झुनझुना, और अब फाइलों में ही हमारे गाँव को खंडर कर रहे हैं लोग। ये जो हाकिम हैं, मुगालता है इन्हें अपनी ऊँची दीवारों का, इन्हें क्या खबर कि अब तूफानों में बसर कर रहे हैं लोग। वे बाँट रहे हैं मरहम, मगर अपनी सहूलियत और शर्तों पर, इलाज के वास्ते भी अब यहाँ दर-ब-दर कर रहे हैं लोग। उन्हें लगता है कि ये जो सन्नाटा है, ये हमारी मुकम्मल हार है, हकीकत ये है कि अपनी चीखों को अब ज़हर कर रहे हैं लोग।
शहर की इस अंधी दौड़ में मैंने कल एक ठहरा हुआ पल देखा। वो पल... जो मेरी बालकनी की रेलिंग पर धूप में थक कर बैठी, एक छोटी सी चिड़िया की सहमी हुई आँखों में छिपा था। हम सब भाग रहे हैं, अपनी-अपनी ट्रेन पकड़ने। कुछ ईएमआई चुकाने के लिए भाग रहे हैं, तो कुछ... उन सपनों के पीछे, जो नींद में नहीं, खुली आँखों से देखे गए थे। पर इस बेतहाशा भागदौड़ में, छूट क्या रहा है? शायद... वो मैं ही हूँ। जो कहीं बहुत पीछे छूट गया है, और उस खाली सड़क पर खड़ा... मुझ ही को वापस लौटने की आवाज़ लगा रहा है।
प्रेम हमेशा कविताओं सा लयबद्ध नहीं होता। कभी-कभी यह... तुम्हारे ठंडे हो चुके चाय के कप को, चुपके से गर्म चाय से बदल देने का नाम है। यह... मेरे बिखरे हुए सवालों की भीड़ में, तुम्हारा एक शांत सा जवाब होना है। हम अक्सर ढूँढते हैं प्रेम को बड़े-बड़े वादों में, किताबों के पन्नों में, या फिल्मों जैसी उस बेमौसम बारिश में। पर मैंने इसे पाया है... उस एक पल में, जब तुम बिना कुछ कहे, मेरे माथे की सिलवटों को देखकर एक हल्का सा मुस्कुरा देते हो। कहने को तो कोई बहुत बड़ी बात नहीं है, पर इस शोर भरी दुनिया में... मेरा बेतहाशा बोलना, और तुम्हारा, सब कुछ छोड़कर... मुझे बस सुनते जाना। शायद... यही तो प्रेम है।
मैंने दुनिया के नक्शे देखे हैं, बड़े-बड़े शहर, ऊँची इमारतें, और मजबूत किले देखे हैं। मगर मुझे, कहीं भी वह सुरक्षा महसूस नहीं हुई, जो तुम्हारे कंधे पर सिर रखकर होती है। जब तुम मुझे अपनी बाहों में घेर लेती हो, तो लगता है कि दुनिया की कोई मुसीबत, मुझे छू भी नहीं सकती। वहाँ न धूप है, न बारिश, न किसी कल की चिंता। वहाँ सिर्फ़ एक धीमी सी धड़कन है, जो लोरी की तरह सुनाई देती है। मैं पूरी दुनिया घूम सकता हूँ, मगर जब 'घर' लौटने का मन करता है, तो मेरे कदम, तुम्हारी ओर ही मुड़ते हैं।
याद है वह ट्रेन का सफ़र? जब हमने तय किया था कि मंज़िल ज़रूरी नहीं, बस चलना ज़रूरी है। तुमने ज़िद करके खिड़की वाली सीट ली थी, और मैं तुम्हें देख रहा था— कभी बाहर भागते हुए पेड़ों को देखते हुए, और कभी हवा से उलझती अपनी लटों को सुलझाते हुए। डिब्बे में भीड़ थी, शोर था, चाय वाले की आवाज़ थी, मगर हमारे बीच एक अलग ही दुनिया बसी थी। तुम्हारे कंधे पर मेरा सिर, और मेरे हाथ में तुम्हारा हाथ। हज़ारों मील की पटरी, जैसे हमारी कहानी लिख रही थी। तुमने कहा था— "काश यह रास्ता कभी ख़त्म न हो।" और सच कहूँ? मैं भी यही दुआ कर रहा था। जब हम किसी अनजान स्टेशन पर उतरे, जहाँ कोई हमें जानता नहीं था, तब पहली बार लगा कि हम 'अकेले' नहीं हैं, हम एक-दूसरे के साथ 'पूरे' हैं। दुनिया का नक्शा चाहे कितना भी बड़ा हो, मेरी दुनिया अब सिर्फ़ उतनी थी, जितनी दूर तक तुम्हारा हाथ मेरे हाथ में था।
एक पूरा का पूरा शहर मेरे भीतर आज मर गया, वो क्या गया, कि लफ़्ज़ों का सारा नशा ही उतर गया। आजकल तो तुम बस की-बोर्ड पर रगड़ते हो जज़्बातों को, रूह में जो सीधी कील ठोक दे, वो लुहार किधर गया? मौत से सौदेबाज़ी में भी उसने कोई दलाली नहीं की, हम किश्तों में टूट रहे थे, वो एकमुश्त ही मर गया। रिश्तों की मैली कमीज़ अब कौन धोएगा खारे आँसुओं से, वो जो दर्द को चबाकर थूकता था, वो आख़िरी फनकार गुज़र गया। अब ढूँढते रहना उसे इन नीली रोशनियों के मलबे में, ज़मीन का एक कच्चा दर्द आज उस पार जाकर बिखर गया।
कभी मुझे पढ़ना तो शुरुआत मेरी आँखों और होठों से करना… वहाँ पाओगे तुम, आँखों में अपार मासूमियत तुम्हारे लिए, और होठों पर प्रेम, मुस्कान बनकर… एक ऐसा प्रेम, जो खुद से तो हो ही, बल्कि सबसे हो जाए…🌸
मुझे प्यार है इन पहाड़ों से। मुझे प्यार है इन नदियों-झीलों से। मुझे प्यार है इन हवाओं से, जो छूकर बस राहत दे जाती हैं। मुझे प्यार है इन फूलों से, जो कहीं न कहीं खुद को चाहते हैं। मुझे प्यार है बारिश की उन बूंदों से, जो चिल्लाती हैं कभी तेज, कभी धीरे। मुझे प्यार है इन पक्षियों से, जो समझते हैं सिर्फ प्रेम की भाषा। मुझे प्यार है मेरे बाजू बैठे हर उस इंसान से, जो कम बोले लेकिन समझकर बोले। और फिर प्यार हो भी क्यों न… ये सबसे प्यार है इसलिए, क्योंकि खुद से प्यार है मुझे।