दिल्ली के दरबारों में जब, शिक्षा का सौदा होता है,
तब किसी गरीब का बेटा, भीतर ही भीतर रोता है।
धर्मेंद्र प्रधान बताओ, ये कैसी रखवाली है?
आयोगों की कुर्सी पर क्यों बैठी दलाली है?
NTA और SSC के हाकिम, एसी में सो जाते हैं,
मेहनत की गर्दन दबाकर, दलालों से हाथ मिलाते हैं।
जब सूटकेस के वजन से, अफसर की टोपी सजती है,
तब भारत के हर गाँव में, एक माँ चुपचाप सिसकती है।
किताबों के पन्ने घिस-घिस कर, जवानी जिसने राख़ करी,
उसकी किस्मत चोरों की मंडी में, तुमने सरेआम ख़ाक करी।
फटी जेब से गिरते वक़्त को, कब तक यूँ मरते देखेंगे?
इन झूठे वादों की चौखट पर, कब तक माथा टेकेंगे?
ये पेपर लीक नहीं साहब, ये सपनों का जनाज़ा है,
हर बिकते प्रश्नपत्र के पीछे, एक घर भूखा-प्यासा है।
चेयरमैनों की ख़ामोशी ने, कैसी ये आग लगाई है,
भविष्य की हर हरी डाली, भीतर से सूखाई है।
पुरानी दीवार के चूने सा, भविष्य हमारा झड़ता है,
और सत्ता का अंधा राजा, अपने महलों में अकड़ता है।
उसे क्या दर्द समझ आएगा, जो भूख कभी न जान सका,
जिसने माँ की टूटी चूड़ी का, मौन विलाप न पहचान सका।
अरे दिल्ली! तुझको क्या एहसास है फटी बिवाई वालों का?
क्या पता तुझे मूल्य पसीने से भीगे निवालों का?
तूने हँसकर उड़ा दी खिल्ली, मेहनत की इस जवानी की,
और सड़कें रोज़ गवाह बनीं, टूटी हुई कहानी की।
कोई पूछो इन मठाधीशों से, नींद इन्हें कैसे आती है?
जब एक गरीब की भूखी पीढ़ी, लाठियाँ खाकर जाती है।
जब बाप की झुकी कमर, बेटे की हार में टूटती है,
और माँ मंदिर में रो-रोकर, किस्मत से लड़ती छूटती है।
पर कान खोल कर सुन लो तुम, ऐ सत्ता के व्यापारियों,
अब बहुत हो चुकी मनमानी, ऐ भ्रष्टाचार के पुजारियों।
जिस दिन सब्र का बाँध टूटा, तुम बच न यहाँ से पाओगे,
इन फटे जूतों की ठोकर से, तख़्त सहित मिट जाओगे।
क्योंकि भूखा आदमी जब आख़िरी हद से गुजरता है,
तब इतिहास नहीं पढ़ता, इतिहास स्वयं रचता है।