सभा भरी थी, दीप जले थे, स्वर्णिम था दरबार बड़ा,
मखमल पर बैठे थे चेहरे, जिनका था संसार बड़ा।
पर उस वैभव की छाती पर एक प्रश्न तलवार बना,
एक युवक के सूखे अधरों से उठकर अंगार बना।
वह बोला—
"क्यों मुझको ही बार-बार यह जग पहचान बताता है?
क्यों मेरे हर स्वप्न के आगे कुल का पहरा आता है?
मैंने भी तो भोर जगाई, मैंने भी संध्या देखी,
मैंने भी माँ की आँखों में आशाओं की गंगा देखी।
फिर क्यों मेरे हाथों की रेखाएँ छोटी ठहराई हैं?
क्यों मेरे हिस्से की नदियाँ पहले ही सुखवाई हैं?
मैंने जब भी ज्ञान माँगा, मुझको सीमा सौंप दी गई,
मैंने जब सम्मान माँगा, केवल निंदा दी गई।
मेरे भीतर जो सूरज था, उसको ढकने निकले लोग,
अपनी छोटी छाया लेकर पर्वत बनने निकले लोग।
पर सुन लो, मैं हार मानकर बैठ नहीं सकता पथ में,
अग्नि अगर जन्मी है मुझमें, जलना होगा इस रथ में।
मुझको रोकोगे तो मेरी प्रतिध्वनि पर्वत चीर उठेगी,
एक चिंगारी दबाओगे, सौ-सौ ज्वालाएँ फूटेंगी।
मैंने देखा भूखे बच्चे रोटी की ओर निहार रहे,
और महल के उत्सव में कुछ चेहरे मद में डूबे थे।
मैंने देखा खेतों में श्रम का रक्त पसीना बहता था,
और नगर में उसका मूल्य सिक्कों से भी सस्ता था।
मुझसे मत पूछो मैं किस कुल का, क्या वंश मेरा कहलाता,
पूछो केवल इतना, मुझमें कितना साहस मुस्काता।
नदियों का परिचय सागर है, बादल का परिचय वर्षा,
मानव का परिचय कर्मों से, बाकी सब तो केवल चर्चा।
यदि मिट्टी में शक्ति नहीं तो राजमहल कब बन पाएँगे?
यदि श्रमिकों के हाथ रुकें तो उत्सव कैसे आएँगे?
जो धरती को अन्न उगाएँ, वे ही भूखे सो जाते हैं,
और जिन्हें श्रम का अर्थ न मालूम, वे उपदेश सुनाते हैं।
इसलिए आज घोषणा करता हूँ सुन ले यह संसार नया—
मानव का मस्तक ऊँचा होगा, टूटेगा हर अत्याचार नया।
जो अधिकार छिने बैठे हैं, वे अधिकार जगेंगे फिर से,
जो सपने घायल बैठे हैं, वे सपने चलेंगे फिर से।
मैं आँधी से लड़ जाऊँगा, यदि पथ में दीवार मिले,
मैं सागर से भिड़ जाऊँगा, यदि साहिल लाचार मिले।
मेरे भीतर बैठा मानव अब और नहीं झुक पाएगा,
सत्य भले ही देर करे पर अंततः जीत जाएगा।
इतना कहकर वह चुप बैठा, पर शब्द अमर हो जाते हैं,
कुछ स्वर केवल स्वर होते हैं, कुछ इतिहास बन जाते हैं।
उस दिन भी एक प्रश्न उठा था मानव के सम्मानों पर,
और आज भी वह प्रश्न खड़ा है सत्ता के दरबारों पर।
जब तक ऊँच-नीच की जंजीरें धरती पर रह जाए