साथ की उम्र 🌸
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Books semantically related to this poem.

Agar phir kabhi poocha jaye...
by Virendra Kumar Patel
अगर फिर कभी पूछा जाए… एक ऐसी कहानी है जो वीरेंद्र और चित्रा के बीच शुरू होती है - धीरे, बिना शोर के, जैसे कुछ रिश्ते अपने आप बन जाते हैं। एक कोचिंग क्लास, कुछ साधारण मुलाकातें, और फिर वही बात जो अक्सर समझ में नहीं आती- क्यों कुछ लोग पहली बार में ही अपने लगने लगते हैं। वीरेंद्र शांत है, समझने वाला है। चित्रा अलग है- थोड़ी चुप, थोड़ी मजबूत, और अपने भीतर बहुत कुछ छुपाए हुए। दोनों एक-दूसरे की आदत बन जाते हैं, बिना किसी नाम के, बिना किसी वादे के। लेकिन जैसे-जैसे उनका रिश्ता गहराता है, वैसे-वैसे बाहर की दुनिया भी उनके बीच आकर खड़ी होने लगती है- परिवार, समाज, छोटे शहर की सोच, और वो जिम्मेदारियाँ जो प्यार से बड़ी हो जाती हैं। ये कहानी किसी एक मोड़ की नहीं है, बल्कि उन छोटे-छोटे पलों की है जहाँ रिश्ता बनता भी है और धीरे-धीरे टूटता भी है। जहाँ साथ होने से ज्यादा मुश्किल होता है साथ निभा पाना। जहाँ हर सही चीज़, हर बार सही समय पर नहीं मिलती। ये किताब शादी की कहानी नहीं है, बल्कि उस समझ की कहानी है जो तब आती है जब हम किसी को खोकर भी उसे गलत नहीं ठहरा पाते। और फिर एक दिन… जब सवाल सामने खड़ा होता है - क्या वीरेंद्र और चित्रा सच में साथ हो पाएंगे… या उनका रिश्ता भी उन्हीं कहानियों में शामिल हो जाएगा जो अधूरी रहकर ही पूरी लगती हैं

Baarahmasa । बारहमासा
by Chitra Panwar
‘बारहमासा’ कविता-संग्रह, साल के बारह महीनों पर प्रेम और जीवन के विभिन्न अनुभवों को जोड़-तोड़कर लिखी गईं कविताओं का संकलन है। इसमें जनवरी से लेकर दिसंबर महीने तक की छवियाँ अंकित हैं। कविताएँ इसलिए नई और अलग हैं, क्योंकि इनमें सिर्फ़ प्रेम नहीं, बल्कि दुनिया के तमाम कार्य-व्यापार को गहराई से दर्ज किया गया है। यहाँ प्रेम है, प्रकृति है, समाज है, स्त्री है, मज़दूर और किसान हैं, राजनीति है, पूँजी के कारनामे हैं, सत्ता की निरंकुशता है, गाँधी हैं और वे सब गतिविधियाँ हैं, जो एक संवेदनशील रचनाकार को उत्तेजित करती हैं, परेशान करती हैं, निराश करती हैं और वे भी स्थितियाँ हैं, जो कभी उल्लास, उमंग, आशा और ख़ुशियों का कारण बनती हैं तथा सुख में डालती हैं।

पहली उड़ान
by Kapil Mishra
पहली उड़ान एक ऐसा काव्य संग्रह है जो जीवन की विभिन्न अनुभूतियों—प्रेम, पीड़ा, बिछड़न, आशा, संघर्ष और आत्मचिंतन—को शब्दों में पिरोता है। इस संग्रह में संकलित कविताएं पाठक को भीतर तक झकझोरती हैं और उन्हें खुद से, अपने बीते पलों और आने वाले कल से जोड़ देती हैं। हर कविता एक अलग भावभूमि पर खड़ी है — कोई विरह की तपन को स्वर देती है, तो कोई प्रेम की नमी को। कहीं समाज की कठोर सच्चाई है, तो कहीं आत्मा की कोमल पुकार। यह संग्रह उन पाठकों के लिए है जो केवल पढ़ना नहीं, अनुभव करना चाहते हैं। जिनके लिए कविता केवल रचना नहीं, एक आत्मीय संवाद है।

Buni Hui Rassi
by Bhawani Prasad Mishra
नई कविता के इस जमाने में हम बरसों से आशा लगाये बैठे हैं कि कहीं से नई कविता आयेगी। पुरानी पीढ़ी, बिचली पीढ़ी, नई पीढ़ी और एकदम आज की पीढ़ी सभी ने, चली आ रही कविता से भिन्न कविता लिखने की कोशिश और कभी इस ओर से तो कभी उस ओर से भरोसा बंधता-सा दिखा। किंतु कहना पड़ेगा ‘मेह न बरसा और घटा छाई बहुत।’ अकेला पड़ जाना एक उत्सव है। किंतु उस अकेले पड़ जाने से भीतर-बाहर सब जगह गूंगा हो जाना या समुदायों के अनुकरण में जुट जाना मृत्यु है। जो अपनेपन को जितना ठीक रूप से पाता है, रूप देकर बाहर रख देता है, जिंदगी के अनंत अभिव्यक्ति-प्रकारों में से एक या एकाधिक किसी या किन्ही माध्यमों के द्वारा उसे सामने परोस पाता है, वह अकेलापन नहीं परोसता उत्सव परोसता है। कवि भवानीप्रसाद ने सदा यही उत्सव परोसा है। ‘गीतफरोश’ में वे उतने अकेले नहीं थे जितने ‘चकित है दु:ख’ में दिखलाई दिये। फिर ‘अंधेरी कविताएं’ आई, उनका निविड़ अकेलापन लेकर। ‘बुनी हुई रस्सी’ में उनका यह अनुभव पूरी तस्वीर बनकर उभरा है। अनुभव हवा में नहीं होते—सख्त और ठोस धरती पर होते हैं। शायद पहले शरीर को होते हैं, फिर मन को, फिर बुद्धि को, फिर प्राण को देश और काल से अतीत करके होते हैं। ‘गीतफरोश’ और ‘चकित है दु:ख’ के प्रकाशन में दस वर्षो का अंतराल है और कह सकते कि ‘गीतफरोश’ की कविताओं से ‘चकित है दु:ख’ की कविताएं दस वर्ष आगे तो है ही। दूसरे और तीसरे और फिर इस संग्रह ‘बुनी हुई रस्सी’ में एक-एक वर्ष का अंतराल है, इसका कारण सर्वसामान्य समय की सर्वसामान्य गति न होकर कवि के अल्प और अबाध किसी अनुभव की असामान्य गति है। पाठक देखेंगे कि इन कविताओं का रंग धूमिल है और उनकी आंखों का रंग इस यज्ञ-धूम में निरंतर खुले रहने के कारण लाल हो गया है।

Lifafa - Letters of Manish & Sylph
by Manish
कोविड महामारी के दौरान, जब दुनिया बंद कमरों में सिमट गई थी, कुछ दिलों ने खतों के माध्यम से नई दुनिया की तलाश की। "लिफाफा" एक ऐसी ही अनूठी प्रेम कहानी है, जो दो अनजान प्रेमियों के बीच भेजे गए खतों का संकलन है। इन प्रेमियों ने कभी एक-दूसरे को देखा नहीं, लेकिन अपने दिल की बातें एक-दूसरे से साझा कीं, जिससे उनके संबंधों में एक गहराई और ईमानदारी आई। किताब में उन दोनों की भावनाओं और उनके जीवन के उतार-चढ़ाव को दर्शाया गया है, जो खतों के माध्यम से सामने आए। इस संग्रह में शामिल पत्र आपको उस समय की याद दिलाते हैं जब हर कोई अनिश्चितता से घिरा हुआ था, लेकिन ये खत एक-दूसरे के लिए उम्मीद की किरण बने। जैसे कि एक पत्र में लिखा है, "जब महसूस हो कि सब ख़त्म हो चुका है तो एक ज़ोरदार कमबैक करना ही मैजिक है।" इस किताब में न केवल प्रेम और संबंधों की गहराई को समझा जा सकता है, बल्कि यह भी देखा जा सकता है कि कैसे कुछ शब्द जीवन को बदल सकते हैं। "लिफाफा" आपको उस समय की यात्रा पर ले जाता है जब खतों ने दिलों को जोड़ा और जीवन को नया अर्थ दिया।

HAMINASTO: JO KAHIN, SAB YAHIN / हमींअस्तो: जो कहीं, सब यहीं : (NAYI KAVITAEN AUR SHAYARIYAN) / (नई कविताएँ और शायरियाँ)
by Shiv Shankar Jha
The writer is on a search spree: a search for his true identity. His identity as a devotee, as a lover, as a loyal son of the land and as a poet. The poet, through his words, has tried to turn all the stones of human personality upside down. The author believes that peace can be found outside only if there is peace within. Harmony within us is a thing to celebrate. Posing questions to oneself, cheering oneself and being unsatisfied with oneself are all inseparable human traits. Each feeling should be cherished with the thought that nothing is eternal in this world. There is no perfect end or beginning to anything. Beauty lies in this fleeting moment, and these handful of poems are an honest attempt to share this realisation with the world.

Bahut Din Chup Rahne Ke Baad । बहुत दिन चुप रहने के बाद
by Jyoti Sharma
बहुत दिन चुप रहने के बाद — यह संग्रह सिर्फ़ कविताओं का संकलन नहीं, बल्कि स्त्री-अस्मिता, ऐन्द्रिकता और निजता का सशक्त दस्तावेज़ है। ज्योति शर्मा की आवाज़ उस गहरे मौन से निकलती है, जिसमें अनगिनत स्त्रियों की कहानियाँ दबा दी जाती हैं। उनकी कविताओं में सर्दियों की धूप का सुकून है, बरसाती रातों का अकेलापन है, और क्रांति की अनहद गरज भी — कभी प्रेम के मुलायम रेशों में लिपटी, तो कभी सवालों की चिंगारी से सुलगी हुई। ज्योति की कविताएँ घर-आँगन, रिश्तों, देह और स्मृतियों के अदृश्य कोनों में उतर जाती हैं। वे कभी दृढ़ होकर सवाल उठाती हैं, तो कभी माँ की कोमल थपकियों में सिमट जाती हैं। उनकी संवेदनशीलता, सौंदर्य और ऐन्द्रिकता हर पंक्ति में जीवित है — जैसे बंद कमरे में अचानक कोई खिड़की खुल जाए और ताज़ी हवा का झोंका भीतर आ जाए। यह किताब हर उस पाठक के लिए आवश्यक है, जो स्त्री-विमर्श, प्रेम और साहस की नई भाषा को महसूसना चाहता है।