
अगर फिर कभी पूछा जाए… एक ऐसी कहानी है जो वीरेंद्र और चित्रा के बीच शुरू होती है - धीरे, बिना शोर के, जैसे कुछ रिश्ते अपने आप बन जाते हैं। एक कोचिंग क्लास, कुछ साधारण मुलाकातें, और फिर वही बात जो अक्सर समझ में नहीं आती- क्यों कुछ लोग पहली बार में ही अपने लगने लगते हैं। वीरेंद्र शांत है, समझने वाला है। चित्रा अलग है- थोड़ी चुप, थोड़ी मजबूत, और अपने भीतर बहुत कुछ छुपाए हुए। दोनों एक-दूसरे की आदत बन जाते हैं, बिना किसी नाम के, बिना किसी वादे के। लेकिन जैसे-जैसे उनका रिश्ता गहराता है, वैसे-वैसे बाहर की दुनिया भी उनके बीच आकर खड़ी होने लगती है- परिवार, समाज, छोटे शहर की सोच, और वो जिम्मेदारियाँ जो प्यार से बड़ी हो जाती हैं। ये कहानी किसी एक मोड़ की नहीं है, बल्कि उन छोटे-छोटे पलों की है जहाँ रिश्ता बनता भी है और धीरे-धीरे टूटता भी है। जहाँ साथ होने से ज्यादा मुश्किल होता है साथ निभा पाना। जहाँ हर सही चीज़, हर बार सही समय पर नहीं मिलती। ये किताब शादी की कहानी नहीं है, बल्कि उस समझ की कहानी है जो तब आती है जब हम किसी को खोकर भी उसे गलत नहीं ठहरा पाते। और फिर एक दिन… जब सवाल सामने खड़ा होता है - क्या वीरेंद्र और चित्रा सच में साथ हो पाएंगे… या उनका रिश्ता भी उन्हीं कहानियों में शामिल हो जाएगा जो अधूरी रहकर ही पूरी लगती हैं
Publication year
2026
Language
Hindi
Publisher
साहित्य सूत्र – शब्दों का मंच, अभिव्यक्ति का उत्सव
ISBN
978-93-47323-46-1

वीरेंद्र पटेल जबलपुर, मध्यप्रदेश से जुड़े एक मॉडर्न लेखक और डिजिटल क्रिएटर हैं, जो शब्दों के माध्यम से भावनाओं को नई अभिव्यक्ति देते हैं। उनका लेखन केवल पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि गहराई से महसूस करने के लिए होता है। प्रेम, रिश्ते, आत्मचिंतन और आज की पीढ़ी के संवेदनशील विषय उनके कंटेंट का केंद्र हैं। वे कहानियों, मोनोलॉग और शॉर्ट-फॉर्म कंटेंट के जरिए ऐसी बातें सामने लाते हैं, जो सीधे दिल तक पहुँचती हैं। डिजिटल दुनिया में सक्रिय रहते हुए उनका फोकस ट्रेंड का पीछा करना नहीं, बल्कि ऑथेंटिक और रिलेटेबल कंटेंट बनाना है। उनका उद्देश्य है — ऐसे शब्द रचना जो लोगों को खुद से जोड़ें, सोचने पर मजबूर करें और भीतर एक सकारात्मक बदलाव जगाएँ।
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