
नई कविता के इस जमाने में हम बरसों से आशा लगाये बैठे हैं कि कहीं से नई कविता आयेगी। पुरानी पीढ़ी, बिचली पीढ़ी, नई पीढ़ी और एकदम आज की पीढ़ी सभी ने, चली आ रही कविता से भिन्न कविता लिखने की कोशिश और कभी इस ओर से तो कभी उस ओर से भरोसा बंधता-सा दिखा। किंतु कहना पड़ेगा ‘मेह न बरसा और घटा छाई बहुत।’ अकेला पड़ जाना एक उत्सव है। किंतु उस अकेले पड़ जाने से भीतर-बाहर सब जगह गूंगा हो जाना या समुदायों के अनुकरण में जुट जाना मृत्यु है। जो अपनेपन को जितना ठीक रूप से पाता है, रूप देकर बाहर रख देता है, जिंदगी के अनंत अभिव्यक्ति-प्रकारों में से एक या एकाधिक किसी या किन्ही माध्यमों के द्वारा उसे सामने परोस पाता है, वह अकेलापन नहीं परोसता उत्सव परोसता है। कवि भवानीप्रसाद ने सदा यही उत्सव परोसा है। ‘गीतफरोश’ में वे उतने अकेले नहीं थे जितने ‘चकित है दु:ख’ में दिखलाई दिये। फिर ‘अंधेरी कविताएं’ आई, उनका निविड़ अकेलापन लेकर। ‘बुनी हुई रस्सी’ में उनका यह अनुभव पूरी तस्वीर बनकर उभरा है। अनुभव हवा में नहीं होते—सख्त और ठोस धरती पर होते हैं। शायद पहले शरीर को होते हैं, फिर मन को, फिर बुद्धि को, फिर प्राण को देश और काल से अतीत करके होते हैं। ‘गीतफरोश’ और ‘चकित है दु:ख’ के प्रकाशन में दस वर्षो का अंतराल है और कह सकते कि ‘गीतफरोश’ की कविताओं से ‘चकित है दु:ख’ की कविताएं दस वर्ष आगे तो है ही। दूसरे और तीसरे और फिर इस संग्रह ‘बुनी हुई रस्सी’ में एक-एक वर्ष का अंतराल है, इसका कारण सर्वसामान्य समय की सर्वसामान्य गति न होकर कवि के अल्प और अबाध किसी अनुभव की असामान्य गति है। पाठक देखेंगे कि इन कविताओं का रंग धूमिल है और उनकी आंखों का रंग इस यज्ञ-धूम में निरंतर खुले रहने के कारण लाल हो गया है।
Publisher
Sarla Prakashan
ISBN
978-8188911004