बेख़बर
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Books semantically related to this poem.

Agar phir kabhi poocha jaye...
by Virendra Kumar Patel
अगर फिर कभी पूछा जाए… एक ऐसी कहानी है जो वीरेंद्र और चित्रा के बीच शुरू होती है - धीरे, बिना शोर के, जैसे कुछ रिश्ते अपने आप बन जाते हैं। एक कोचिंग क्लास, कुछ साधारण मुलाकातें, और फिर वही बात जो अक्सर समझ में नहीं आती- क्यों कुछ लोग पहली बार में ही अपने लगने लगते हैं। वीरेंद्र शांत है, समझने वाला है। चित्रा अलग है- थोड़ी चुप, थोड़ी मजबूत, और अपने भीतर बहुत कुछ छुपाए हुए। दोनों एक-दूसरे की आदत बन जाते हैं, बिना किसी नाम के, बिना किसी वादे के। लेकिन जैसे-जैसे उनका रिश्ता गहराता है, वैसे-वैसे बाहर की दुनिया भी उनके बीच आकर खड़ी होने लगती है- परिवार, समाज, छोटे शहर की सोच, और वो जिम्मेदारियाँ जो प्यार से बड़ी हो जाती हैं। ये कहानी किसी एक मोड़ की नहीं है, बल्कि उन छोटे-छोटे पलों की है जहाँ रिश्ता बनता भी है और धीरे-धीरे टूटता भी है। जहाँ साथ होने से ज्यादा मुश्किल होता है साथ निभा पाना। जहाँ हर सही चीज़, हर बार सही समय पर नहीं मिलती। ये किताब शादी की कहानी नहीं है, बल्कि उस समझ की कहानी है जो तब आती है जब हम किसी को खोकर भी उसे गलत नहीं ठहरा पाते। और फिर एक दिन… जब सवाल सामने खड़ा होता है - क्या वीरेंद्र और चित्रा सच में साथ हो पाएंगे… या उनका रिश्ता भी उन्हीं कहानियों में शामिल हो जाएगा जो अधूरी रहकर ही पूरी लगती हैं

Buni Hui Rassi
by Bhawani Prasad Mishra
नई कविता के इस जमाने में हम बरसों से आशा लगाये बैठे हैं कि कहीं से नई कविता आयेगी। पुरानी पीढ़ी, बिचली पीढ़ी, नई पीढ़ी और एकदम आज की पीढ़ी सभी ने, चली आ रही कविता से भिन्न कविता लिखने की कोशिश और कभी इस ओर से तो कभी उस ओर से भरोसा बंधता-सा दिखा। किंतु कहना पड़ेगा ‘मेह न बरसा और घटा छाई बहुत।’ अकेला पड़ जाना एक उत्सव है। किंतु उस अकेले पड़ जाने से भीतर-बाहर सब जगह गूंगा हो जाना या समुदायों के अनुकरण में जुट जाना मृत्यु है। जो अपनेपन को जितना ठीक रूप से पाता है, रूप देकर बाहर रख देता है, जिंदगी के अनंत अभिव्यक्ति-प्रकारों में से एक या एकाधिक किसी या किन्ही माध्यमों के द्वारा उसे सामने परोस पाता है, वह अकेलापन नहीं परोसता उत्सव परोसता है। कवि भवानीप्रसाद ने सदा यही उत्सव परोसा है। ‘गीतफरोश’ में वे उतने अकेले नहीं थे जितने ‘चकित है दु:ख’ में दिखलाई दिये। फिर ‘अंधेरी कविताएं’ आई, उनका निविड़ अकेलापन लेकर। ‘बुनी हुई रस्सी’ में उनका यह अनुभव पूरी तस्वीर बनकर उभरा है। अनुभव हवा में नहीं होते—सख्त और ठोस धरती पर होते हैं। शायद पहले शरीर को होते हैं, फिर मन को, फिर बुद्धि को, फिर प्राण को देश और काल से अतीत करके होते हैं। ‘गीतफरोश’ और ‘चकित है दु:ख’ के प्रकाशन में दस वर्षो का अंतराल है और कह सकते कि ‘गीतफरोश’ की कविताओं से ‘चकित है दु:ख’ की कविताएं दस वर्ष आगे तो है ही। दूसरे और तीसरे और फिर इस संग्रह ‘बुनी हुई रस्सी’ में एक-एक वर्ष का अंतराल है, इसका कारण सर्वसामान्य समय की सर्वसामान्य गति न होकर कवि के अल्प और अबाध किसी अनुभव की असामान्य गति है। पाठक देखेंगे कि इन कविताओं का रंग धूमिल है और उनकी आंखों का रंग इस यज्ञ-धूम में निरंतर खुले रहने के कारण लाल हो गया है।

She & Hers
by Manav Kaul
What really is the true definition of love? That which we set, or that which our bodies define? When Yash meets Renu, they quickly move from the physical to the metaphysical plane where Renu’s story is unfolding itself in ways that it begins to shake Yash’s world. And as he starts to question his ideas of manhood, of love, of normalcy, he also helps build another world—a world of love, inhabited and unsullied by men. From delicate layers of human emotions, the author builds a narrative that shows a mirror to patriarchy and redundant notions of love. He punctures the ideals of male gaze and male superiority and jabs a finger at societal norms and the idea of ‘normal’. She & Hers is not just a story of queer love, it’s also a multidimensional lens under which each character though flawed, seeks a life of fulfilment and understanding.

Baarahmasa । बारहमासा
by Chitra Panwar
‘बारहमासा’ कविता-संग्रह, साल के बारह महीनों पर प्रेम और जीवन के विभिन्न अनुभवों को जोड़-तोड़कर लिखी गईं कविताओं का संकलन है। इसमें जनवरी से लेकर दिसंबर महीने तक की छवियाँ अंकित हैं। कविताएँ इसलिए नई और अलग हैं, क्योंकि इनमें सिर्फ़ प्रेम नहीं, बल्कि दुनिया के तमाम कार्य-व्यापार को गहराई से दर्ज किया गया है। यहाँ प्रेम है, प्रकृति है, समाज है, स्त्री है, मज़दूर और किसान हैं, राजनीति है, पूँजी के कारनामे हैं, सत्ता की निरंकुशता है, गाँधी हैं और वे सब गतिविधियाँ हैं, जो एक संवेदनशील रचनाकार को उत्तेजित करती हैं, परेशान करती हैं, निराश करती हैं और वे भी स्थितियाँ हैं, जो कभी उल्लास, उमंग, आशा और ख़ुशियों का कारण बनती हैं तथा सुख में डालती हैं।

Satya Aur Yatharth
by J Krishnamurti
"सत्य और वास्तविकता के बीच सम्बन्ध क्या है? वास्तविकता, जैसा कि हमने कहा था, वे सब वस्तुयें हैं जिन्हें विचार ने जमा किया है वास्तविकता शब्द का मूल अर्थ वस्तुएं अथवा वस्तु है और वस्तुओं के संसार में रहते हुए, जो कि वास्तविकता है, हम एक ऐसे संसार से सम्बन्ध कायम रखना चाहते हैं जो अ-वस्तु-है, 'नो थिंग' है-जो कि असम्भव है हम यह कह रहे हैं कि चेतना, अपनी समस्त अंतरवस्तु सहित, समय कि वह हलचल है इस हलचल में ही सारे मनुष्य प्राणी फंसे हैं और जब वह मर जाते हैं, तब भी वह हलचल, वह गति जारी रहती है ऐसा ही है; यह एक तथ्य है और वह मनुष्य जो इसकी सफलता को देख लेता है यानी इस भय, इस सुखाकांषा और इस विपुल दुःख-दर्द का, जो उसने खुद पर लादा है तथा दूसरों के लिए पैदा किया है, इस सारी चीज़ का, और इस 'स्व', इस 'मैं' की प्रकृति एवं सरचना का, इस सबका संपूर्ण बोध उसे यथारथ होता है तब वह उस प्रवाह से, उस धारा से बाहर होता है और वही चेतना में आर-पार का पल है... चेतना में उत्परिवर्तन, 'mutation', समय का अंत है, जो कि उस 'मैं' का अंत है जिसका निर्माण समय के जरिये किया गया है क्या यह उत्परिवर्तन वस्तुतः घटित हो सकता है ? या फिर, यह भी अन्य सिद्धांतो कि भांति एक सिद्धांत मात्र है? क्या कोई मनुष्य या आप, सचमुच इसे कर सकते है?" संवाद, वार्तायों एवँ प्रशनोत्तर के माध्यम से जीवन की सम्गरता पर जे. कृष्णमूर्ति के संग-साथ अतुल्य विमर्श...

Karta Ne Karm Se । कर्ता ने कर्म से (PB)
by Manav Kaul
हम जितने होते हैं वो हमें हमसे कहीं ज़्यादा दिखाती है। कभी एक गुथे पड़े जीवन को कलात्मक कर देती है तो कभी उसके कारण हमें डामर की सड़क के नीचे पगडंडियों का धड़कना सुनाई देने लगता है। वह कविता ही है जो छल को जीवन में पिरोती है और हमें पहली बार अपने ही भीतर बैठा वह व्यक्ति नज़र आता है जो समय और जगह से परे, किसी समानांतर चले आ रहे संसार का हिस्सा है। कविता वो पुल बन जाती है जिसमें हम बहुत आराम से दोनों संसार में विचरण करने लगते हैं। हमें अपनी ही दृष्टि पर यक़ीन नहीं होता, हम अपने ही नीरस संसार को अब इतने अलग और सूक्ष्म तरीक़े से देखने लगते हैं कि हर बात हमारा मनोरंजन करती नज़र आने लगती है। —मानव कौल.

Ashtavakra Mahageeta Bhag I Mukti Ki Aakansha (अष्टावक्र महागीता भाग 1 मुक्ति की आकांक्षा): Mukti Ki Aakansha ... आकांशì
by Osho
तुम मुझे जब सुनो तो ऐसे सुनो जैसे कोई किसी गायक को सुनता है। तुम मुझे ऐसे सुनो जैसे कोई किसी कवि को सुनता है। तुम मुझे ऐसे सुनो कि जैसे कोई कभी पक्षियों के गीतों को सुनता है, या पानी की मरमर को सुनता है, या वर्षा में गरजते मेघों को सुनता है। तुम मुझे ऐसे सुनो कि तुम उसमें अपना हिसाब मत रखो। तुम आनंद के लिए सुनो। तुम रस में डूबो। तुम यहां दुकानदार की तरह मत आओ। तुम यहां बैठे-बैठे भीतर गणित मत बिठाओ कि क्या इसमें से चुन लें और क्या करें, क्या न करें। तुम मुझे सिर्फ आनंद-भाव से सुनो। स्वान्तः सुखाय तुलसी रघुनाथ गाथा! स्वान्तः सुखाय... सुख के लिए सुनो। उस सुख में सुनतेसुनते जो चीज तुम्हें गदगद कर जाए, उसमें फिर थोड़ी और डुबकी लगाओ। मेरा गीत सुना, उसमें जो कड़ी तुम्हें भा जाए, फिर तुम उसे गुनगुनाओ; उसे तुम्हारा मंत्र बन जाने दो। धीरे-धीरे तुम पाओगे कि जीवन में बहुत कुछ बिना बड़ा आयोजन किए घटने लगा।