Arpit Kumar6 May 2026
“मोक्ष की भीड़ में मरता मनुष्य”
SpiritualPhilosophicalOde#spirituality#futility#emptiness+4 more
पत्थरों को पूजने की ज़िद में हम क्या कर गए, देवता तो बच गए, इंसान सारे मर गए।
मोक्ष की अंधी हवस में, क्या हुआ मत पूछिए, हाड़-माँस के थे जो ढाँचे, फर्श पर बिखर गए।
भीड़ के जूतों तले पिसता रहा कोई पिता, और पीतल के खुदा, गर्भगृह में सँवर गए।
चीखें सारी घुट गईं, उन शंख की आवाज़ में, खून के छींटे कई, उस संगमरमर पे उतर गए।
स्वर्ग जाने की हवस में, मौत से ही जा मिले, ज़िंदगी की आख़िरी देहलीज़ पे वो ठहर गए।
रूह को तो आज तक छुआ नहीं इस भीड़ ने, बस लहू से सीढ़ियों के पोर सारे भर गए।
हम गए थे उम्र की मोहलत वहाँ पर माँगने, अपनी ही साँसों के कच्चे सूत सब हम कतर गए।
आस्था की इस मंडी में, सौदा बड़ा सस्ता रहा, छूटने थे जो भरम, वो ज़ेहन में और घर गए।
पूछता है ये हाशिया, अब शून्य के इस मोड़ पर, वो जो इंसानियत के दावे थे, आख़िर किधर गुज़र गए?
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