
by Arpit Kumar
"यह किताब जीवन को समझाने नहीं आई है। यह आपको उस जगह ले जाती है जहाँ हर समझ टूट जाती है। “शून्य के हाशिये पर” उन लोगों की किताब है जो जी तो रहे हैं, पर भीतर से खाली हो चुके हैं। यहाँ शब्द सहारा नहीं देते— ये छीनते हैं। पहचान, भरोसा, उम्मीद, और वो सारी कहानियाँ जो इंसान खुद से झूठ बोलने के लिए गढ़ता है। इस किताब में न कोई समाधान है, न कोई रास्ता, न कोई उजाला। यह सिर्फ़ एक ठंडा सच है— कि इंसान अंततः अपने ही बनाए अर्थों से थककर शून्य के किनारे खड़ा होता है। हर पन्ना आपसे एक सवाल छीनता है और बदले में एक और गहरी ख़ामोशी दे देता है। यह किताब उनके लिए है: जो भीतर से टूट चुके हैं, पर स्वीकार नहीं करते जो भीड़ में रहकर भी खुद से कट चुके हैं जो अब “सब ठीक हो जाएगा” सुनकर थक चुके हैं जो सच चाहते हैं, चाहे वो सहन न हो अगर आप उम्मीद, प्रेरणा या राहत ढूँढ रहे हैं— तो यह किताब आपके लिए नहीं है। लेकिन अगर आप अपने भीतर के आख़िरी भ्रम को भी मरते हुए देखने की हिम्मत रखते हैं, तो “शून्य के हाशिये पर” आपको वहीं छोड़ देगी जहाँ से लौटने का रास्ता नहीं होता। यह किताब पढ़ी नहीं जाती— यह भुगती जाती है।"
Publisher
BS Production
ISBN
978-9370466302

arpitkumar808139@gmail.com
अर्पित कुमार (आयु 19 वर्ष) का जन्म उत्तर प्रदेश के उन्नाव ज़िले में हुआ और वर्तमान में वे रायबरेली में निवास करते हैं। इनके पिता श्री इन्दल एवं माता श्रीमती सुनीता हैं। अर्पित कुमार एक उभरते हुए हिंदी कवि एवं लेखक हैं। इन्होंने लेखन की शुरुआत कक्षा 10वीं से की, जब शब्द उनके लिए केवल अभिव्यक्ति नहीं बल्कि आत्मसंवाद का माध्यम बन गए। सामाजिक यथार्थ, मानवीय संवेदनाएँ, पितृसत्ता, धार्मिक विसंगतियाँ और अस्तित्व के प्रश्न उनकी रचनाओं के प्रमुख विषय हैं। इनकी पहली पुस्तक “शून्य के हाशिये पर” प्रकाशित हो चुकी है, जिसमें जीवन, संघर्ष और आत्ममंथन की गहरी छाप दिखाई देती है। वर्तमान में अर्पित कुमार संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की तैयारी कर रहे हैं और साहित्य तथा चिंतन—दोनों क्षेत्रों में निरंतर साधना कर रहे हैं। उनका मानना है कि लेखन केवल भावनाओं का प्रदर्शन नहीं, बल्कि समाज के सामने सच रखने का दायित्व है।