
शून्य के हाशिये पर : नीलगंज में जन्मी एक अनपढ़ कहानी
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"यह किताब जीवन को समझाने नहीं आई है। यह आपको उस जगह ले जाती है जहाँ हर समझ टूट जाती है। “शून्य के हाशिये पर” उन लोगों की किताब है जो जी तो रहे हैं, पर भीतर से खाली हो चुके हैं। यहाँ शब्द सहारा नहीं देते— ये छीनते हैं। पहचान, भरोसा, उम्मीद, और वो सारी कहानियाँ जो इंसान खुद से झूठ बोलने के लिए गढ़ता है। इस किताब में न कोई समाधान है, न कोई रास्ता, न कोई उजाला। यह सिर्फ़ एक ठंडा सच है— कि इंसान अंततः अपने ही बनाए अर्थों से थककर शून्य के किनारे खड़ा होता है। हर पन्ना आपसे एक सवाल छीनता है और बदले में एक और गहरी ख़ामोशी दे देता है। यह किताब उनके लिए है: जो भीतर से टूट चुके हैं, पर स्वीकार नहीं करते जो भीड़ में रहकर भी खुद से कट चुके हैं जो अब “सब ठीक हो जाएगा” सुनकर थक चुके हैं जो सच चाहते हैं, चाहे वो सहन न हो अगर आप उम्मीद, प्रेरणा या राहत ढूँढ रहे हैं— तो यह किताब आपके लिए नहीं है। लेकिन अगर आप अपने भीतर के आख़िरी भ्रम को भी मरते हुए देखने की हिम्मत रखते हैं, तो “शून्य के हाशिये पर” आपको वहीं छोड़ देगी जहाँ से लौटने का रास्ता नहीं होता। यह किताब पढ़ी नहीं जाती— यह भुगती जाती है।"