
by Bhubneshwar Upadhyay
प्रोडक्ट डिस्क्रिप्शन पौराणिक उपन्यास "मानवीय गुणों की चर्मोत्कर्ष गाथा : राम" बाल्मीकि रामायण की मूल प्रासंगिक घटनाओं को आधार बनाकर राम के जीवन चरित्र को उद्घाटित एवं विश्लेषित करने वाली एक औपन्यासिक रचना है। वैचारिक, मनोवैज्ञानिक, धार्मिक एवं समसमायिकता के मूल सिद्धांतों के आधार पर विभिन्न संवादों और चर्चाओं के माध्यम से इस कृति में रामयण की अनेक और महत्वपूर्ण घटनाओं को पुनः नये सिरे से परिभाषित करने का प्रयास किया है। इस उपन्यास की मुख्य विशेषता इसके तार्किक संवादों, नवीन प्रस्तुतिकरण, और विश्लेषणात्मकता है। जो पाठक को राम के जीवन को एक अलग दृष्टि से जानने और समझने के लिए प्रेरित करती है और मस्तिष्क में उभरे कई प्रश्नों के उत्तर भी देती है, जैसे कि राम की मानवीय जीवन यात्रा कैसे ईश्वरत्व तक पहुँच गई। कालखंड और उत्पन्न परिस्थितियाँ के मध्य स्थापित आदर्श मानवीय जीवन और उसके नैतिक मूल्यों को कैसे प्रभावित करते हैं? आदि... इस कृति में श्रीराम एक सहज और मर्यादित मानवीय जीवन जीते हुए केवल मर्यादापुरुषोत्तम ही नहीं, बल्कि एक ऐसे नायक बनकर उभरते हैं जो उपदेश नहीं देता और न आदेश, बल्कि अपने कठोर निर्णयों, त्याग और पुरुषार्थ के द्वारा उच्चादर्शों और मानवीय मूल्यों को अपनी जीवनशैली में शामिल किया और स्वयं आदर्श स्थापित किये। श्रीराम पूर्ण रूप से समर्थ होते हुए भी अयोध्या के राज्य को ऐसे त्याग देते हैं जैसे उनके लिए उसका अस्तित्व नगण्य हो और वे यहीं नहीं रुके, बल्कि लंका और किष्किंधा जीतकर भी उन्होंने सिंहासन की चाह नहीं की। उनके लिये लोक और लोकमत जितना महत्वपूर्ण था उतना उनके लिए कुछ और नहीं था। वे सदैव ही अपने निजी सुखों को छोड़कर केवल लोक के लिए और मानवीय गुणों को चर्मोत्कर्ष तक ले जाने के लिए जिये। इसीलिए वे सहज मानवीय जीवन को ईश्वरीय बनाने में सफल रहे। इस उपन्यास का कथाक्रम राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न के शिक्षा पूर्ण कर अयोध्या लौटने की चर्चा से आरंभ होता है और विभिन्न प्रासंगिक घटनाओं जैसे- राम जन्म, विवाह, वनवास, सुग्रीव मित्रता, वाली वध, रामसेतु निर्माण, लंका युद्ध, अग्नि परीक्षा, अहिल्या मुक्ति आदि महत्वपूर्ण घटनाओं का चित्रण विभिन्न बिन्दुओं को विश्लेषित कर किया गया है। साथ साथ राम एवं अन्य अयोध्या कुमारों के कुछ अन्य संयुक्त अभियान, राज्य व्यवस्था, सुरक्षा, कानून व्यवस्था को सुव्यवस्थित करना आदि कार्य भी इसके कथाक्रम को गति देते हैं। उस समय के विभिन्न सांस्कृतिक परिवेशों, रहन सहन और जीवन से गुजरते हुए ये कृति रावण विजय के पश्चात अयोध्या बापसी और श्री राम के राजतिलक के दौरान उनके उस तार्किक और दूरदर्शिता से परिपूर्ण उद्बोधन के साथ ही अंत की ओर बढ़ जाती है जिसमें वे अपने मंत्रिमंडल, युवराज पद, अयोध्या की पटरानी की घोषणा के अतिरिक्त भविष्य की योजनाओं के बारे में बताते हैं और रामराज्य की नींव रखते हैं।
Publisher
Vichar Prakashan : Words For The Positive Change

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साहित्यिक परिचय: श्री भुवनेश्वर उपाध्याय वरिष्ठ साहित्यकार, उपन्यासकार एवं प्रधान संपादक विचार प्रकाशन संक्षिप्त विवरण 08 फरवरी 1979 को जन्मे श्री भुवनेश्वर उपाध्याय हिंदी साहित्य के उन विरल हस्ताक्षर हैं, जिनकी लेखनी दर्शन, मनोविज्ञान और पौराणिक आख्यानों को आधुनिक परिप्रेक्ष्य में परिभाषित करती है। हिंदी साहित्य में स्नातकोत्तर (M.A.) श्री उपाध्याय पिछले ढाई दशकों से अधिक समय से लेखन की विभिन्न विधाओं में निरंतर सक्रिय हैं। प्रमुख प्रकाशित कृतियाँ (Major Works) उनकी लेखनी विविधता से भरी है और कई विधाओं में मील का पत्थर साबित हुई है: • प्रमुख उपन्यास: * एक कम सौ o रक्षिका द वारियर o जुआ गढ़: दाँव पर दुनिया o हॉफ मैन: ए पेनफुल जर्नीं o उलझन बुलझन प्यार • पौराणिक एवं दार्शनिक: * महाभारत के बाद o राम की अग्नि परीक्षा o प्रेम प्रक्रिया है • काव्य संग्रह: * समझ के दायरे में o दायरे में सिमटती धूप o फिर वहीं से • चिंतन, व्यंग्य एवं अन्य: * दायरों की दुनिया, फिर भी रुकना ठीक नहीं, बस फुँकारते रहिये, समय की टुकड़ियाँ। o संपादन: "व्यंग्य-व्यंग्यकार और जो जरूरी है" एवं विभिन्न साझा संकलन। अकादमिक प्रभाव एवं शोध (Academic Milestones) • विश्वविद्यालय पाठ्यक्रम: उनकी मजदूरों के जीवन पर आधारित कविता "सड़क दर सड़क", स्वामी रामानंद तीर्थ मराठवाड़ा विश्वविद्यालय, नांदेड़ के बी.ए. (द्वितीय वर्ष) के पाठ्यक्रम का हिस्सा है। • Ph.D. शोध कार्य: उनके साहित्य पर गहन शोध किया गया है। "भुवनेश्वर उपाध्याय के साहित्य में व्यक्त जन जीवन" शीर्षक से शोधार्थी को डॉक्टरेट (Ph.D.) की उपाधि प्रदान की जा चुकी है। • समीक्षात्मक ग्रंथ: उनके कृतित्व पर केंद्रित पुस्तक “भुवनेश्वर उपाध्याय: समीक्षा के निकष पर" (संपादक– डॉ. मुदस्सिर सय्यद) प्रकाशित हो चुकी है। प्रमुख सम्मान • जयपुर साहित्य सम्मान (2022) – कृति: 'उलझन बुलझन प्यार' • मधुकर सृजन सम्मान (2018) – कृति: 'समझ के दायरे में'

Phir Wahi Se... is a collection of stories.

व्यंग्यात्मक शैली और सहज, सरल शब्दों के भाषाई तानेबाने से बुने उपन्यास “जुआगढ़” की कहानी हँसते, गुदगुदाते केवल ‘जुआ’ जैसे लगभग अनछुए विषय पर खुलकर प्रकाश ही नहीं डालती, बल्कि कस्बाई और ग्रामीण क्षेत्रों में पनपते इसके व्यवसायीकरण का विश्लेषणात्मक खाका भी खींचती है। जिसमें एक ओर जुआरियों के जीवन और उनके अंतरद्वंद्वों से जुड़े विभिन्न अनदेखे, अनसुने पहलू और उनसे जुड़े कठोर और निर्मम यथार्थ को “जुआगढ़” रेखांकित करता है तो दूसरी ओर आदमी की उस जंगली मानसिकता को भी उजागर करता है जो सिर्फ अपने बारे में सोचती है और इस एक हार-जीत के खेल को दूसरे के लिए पतन और मौत का सामान बना देती है। जीत की उम्मीद में पैसों को दाँव पर लगाते लगाते कब और कैसे इनकी पूरी दुनिया दाँव पर लग जाती है इन्हें खुद पता नहीं चलता...या फिर ये समझना ही नहीं चाहते!.

" एक कम सौ " उपन्यास की पृष्ठभूमि जिस प्रकार के ग्रामीण सामाजिक, पारिवारिक और आर्थिक परिवेश का प्रतिनिधित्व करती है, लेखक का अपनी भूमिका में " एक कम सौ की एक लम्बे वैचारिक मंथन से इसलिए और निकली क्योंकि मैं नहीं चाहता था कि मेरे पात्र अपने कर्मों के परिणाम को लेकर किसी मुगालते में रहें या अपना दोष किसी और के मत्थे मढ़कर, स्वयं पाक साफ बने रहें। जो हुआ वो न अनजाने में था और न अचानक! तब तो सोच समझकर किये कार्यों के परिणाम भोगने ही थे " ये कहना बहुत महत्वपूर्ण है। यहाँ लेखक अपनी प्रतिबद्धता दर्शाता है। इस उपन्यास के पात्र जैसे भी है; केवल स्वयं को जीते हैं। फिर भी तमाम नकारात्मकताओं के बाद भी लेखक दरकते रिश्तों और छीजती संवेदनाओं के बीच सकारात्मकता, सद्भाव और सुधार के विकल्प भी खोजकर सुझाता है। लेखक का आलोचना से जुड़ाव रचना में वैचारिक कसावट तो लाता ही है, साथ ही पाठकीय रुचि का ध्यान रखते हुए पठनीयता और संप्रेषणीयता को भी ऊंचाई प्रदान करता है, जो कृति की भाषा में झलकती है। उपन्यास का कथात्मक विस्तार कई छोटी-छोटी कहानियों, घटनाओं के माध्यम से सोच और चिंतन के नये द्वारा खोलता है। बुंदेलखंड की सांस्कृतिक और भाषाई महक इसे और रोचकता प्रदान करती है। एक तरफ अभाव और मन में पनपती असुरक्षा की भावना, दूसरी तरफ अहंकार! परिवार को कहाँ ले जाकर छोड़ता है...एक कम सौ, ऐसी जिंदगी के रेशे खोलकर उनके कारण खोजता है।इस कृति में मनोहरलाल जैसा विशुद्ध मानवीय कमजोरियों वाला मुख्य पात्र है तो वहीं उसकी पत्नी के रूप में शांति एक समभाव के साथ आदर्श जीवन के पक्ष में खड़ी रहती है। पटेल, पुजरी, नंबरदार, सरजूलाला, शंभू, रतन, द्वारका, घंसा, राधा, रामवती, करुणावती जैसे पात्र ग्रामीण परिवेश को जीवंत करने के साथ साथ कहानी को गति प्रदान करते हैं। इस कृति के अंत में लेखक कुछ प्रश्न छोड़ जाता है जैसे - मनोहरलाल की मृत्यु के बाद क्या उनका परिवार प्रेम और सद्भाव का पाठ पढ़ पाया या फिर इस विघटन का परिणाम उनकी आगामी पीढ़ियाँ भी भुगतेंगी? ' संस्कार बदलने में सौ साल लगते हैं।' ये कथन इसके दूसरे भाग का संकेत भी देता है। अभी कहना और बाकी है... लेखक में तमाम संभावनाओं के मद्देनजर डॉ. अवधबिहारी पाठक जैसे वरिष्ठ समीक्षक के द्वारा लेखक के लिए कहे गए इन शब्द का यहाँ उपयोग प्रासंगिक ही लगता है - " बौद्धिक चेतना का आत्मिक स्फुरण भुवनेश्वर उपाध्याय के चिंतन और मनन का मूल आधार है। प्राण तो सभी लेखकों में होते हैं, लेकिन लेखन के प्रति प्राणवत्ता जो यहाँ है कम ही देखी गई है। ”

"हॉफमैन" का संरचनात्मक विस्तार एक ओर मनुष्य के सहज समाजिक जीवन को समग्रता से रेखांकित करता है तो दूसरी ओर उसकी बिडम्बनाओं को थर्ड जेंडर के रूप में जन्मे अर्जुन के शापित और तिरस्कृत जीवन के माध्यम से परिभाषित करता है। जहाँ केवल अर्जुन ही अपनी कमियों के कारण पीड़ा नहीं भोगता, बल्कि उसके माँ बाप भी भावनात्मक और मानसिक पीड़ा से दो चार होते हैं। ये उपन्यास इन पीड़ाओं का ही चित्रण नहीं करता, बल्कि कारण और निदान की रूपरेखा भी तैयार करता है। इस उपन्यास का सबसे सशक्त और सकारात्मक पक्ष इसके पात्रों की दृढ संकल्पशक्ति, संघर्षशीलता और उनकी संवेदनाओं में मुखर होता है। वे समझौतावादी जीवन नहीं जीते हैं, बल्कि मेहनत, संघर्ष और प्रेम से अंधेरे में रोशनी की हर उस संभावना को तलाशने की कोशिश करते हैं जो उनके जीवन को बेहतर बना दे। उसमें वे सफल भी रहते हैं। उनकी सजगता ही उनके लक्ष्यों को सफलता तक ले जाने की मार्ग प्रशस्त करती है। इसका मुख्य पात्र अर्जुन भले ही हो, किंतु नीरव दोस्ती, प्रेम और प्रेरक की भूमिका निभाते हुए उससे कहीं कमतर नहीं रहता, बल्कि जीवन को समझकर जीने में वो कहीं अधिक सकारात्मक दिखाई देता है। सुबोध का चरित्र एक एक विशुद्ध आम आदमी वाला है जो जीवन में समझौता भी करता है और थोड़ी खुशियाँ भी चाहता है। एक ओर नीरव और कनुप्रिया का प्रेम जितना सामान्य नजर आता है, उतना ही अर्जुन और दीपा का प्रेम जटिलताओं से भरा प्रतीत होता है, किंतु जब वे इस प्रेम को देह से ऊपर उठाते हुए उसे एक नई ऊंचाई देते है तो प्रभावित करते हैं।