
by Bhubneshwar Upadhyay
"हॉफमैन" का संरचनात्मक विस्तार एक ओर मनुष्य के सहज समाजिक जीवन को समग्रता से रेखांकित करता है तो दूसरी ओर उसकी बिडम्बनाओं को थर्ड जेंडर के रूप में जन्मे अर्जुन के शापित और तिरस्कृत जीवन के माध्यम से परिभाषित करता है। जहाँ केवल अर्जुन ही अपनी कमियों के कारण पीड़ा नहीं भोगता, बल्कि उसके माँ बाप भी भावनात्मक और मानसिक पीड़ा से दो चार होते हैं। ये उपन्यास इन पीड़ाओं का ही चित्रण नहीं करता, बल्कि कारण और निदान की रूपरेखा भी तैयार करता है। इस उपन्यास का सबसे सशक्त और सकारात्मक पक्ष इसके पात्रों की दृढ संकल्पशक्ति, संघर्षशीलता और उनकी संवेदनाओं में मुखर होता है। वे समझौतावादी जीवन नहीं जीते हैं, बल्कि मेहनत, संघर्ष और प्रेम से अंधेरे में रोशनी की हर उस संभावना को तलाशने की कोशिश करते हैं जो उनके जीवन को बेहतर बना दे। उसमें वे सफल भी रहते हैं। उनकी सजगता ही उनके लक्ष्यों को सफलता तक ले जाने की मार्ग प्रशस्त करती है। इसका मुख्य पात्र अर्जुन भले ही हो, किंतु नीरव दोस्ती, प्रेम और प्रेरक की भूमिका निभाते हुए उससे कहीं कमतर नहीं रहता, बल्कि जीवन को समझकर जीने में वो कहीं अधिक सकारात्मक दिखाई देता है। सुबोध का चरित्र एक एक विशुद्ध आम आदमी वाला है जो जीवन में समझौता भी करता है और थोड़ी खुशियाँ भी चाहता है। एक ओर नीरव और कनुप्रिया का प्रेम जितना सामान्य नजर आता है, उतना ही अर्जुन और दीपा का प्रेम जटिलताओं से भरा प्रतीत होता है, किंतु जब वे इस प्रेम को देह से ऊपर उठाते हुए उसे एक नई ऊंचाई देते है तो प्रभावित करते हैं।
Publisher
Vichar Prakashan : Words For The Positive Change
ISBN
978-9389220902

bhubneshwarupadhyay@gmail.com
साहित्यिक परिचय: श्री भुवनेश्वर उपाध्याय वरिष्ठ साहित्यकार, उपन्यासकार एवं प्रधान संपादक विचार प्रकाशन संक्षिप्त विवरण 08 फरवरी 1979 को जन्मे श्री भुवनेश्वर उपाध्याय हिंदी साहित्य के उन विरल हस्ताक्षर हैं, जिनकी लेखनी दर्शन, मनोविज्ञान और पौराणिक आख्यानों को आधुनिक परिप्रेक्ष्य में परिभाषित करती है। हिंदी साहित्य में स्नातकोत्तर (M.A.) श्री उपाध्याय पिछले ढाई दशकों से अधिक समय से लेखन की विभिन्न विधाओं में निरंतर सक्रिय हैं। प्रमुख प्रकाशित कृतियाँ (Major Works) उनकी लेखनी विविधता से भरी है और कई विधाओं में मील का पत्थर साबित हुई है: • प्रमुख उपन्यास: * एक कम सौ o रक्षिका द वारियर o जुआ गढ़: दाँव पर दुनिया o हॉफ मैन: ए पेनफुल जर्नीं o उलझन बुलझन प्यार • पौराणिक एवं दार्शनिक: * महाभारत के बाद o राम की अग्नि परीक्षा o प्रेम प्रक्रिया है • काव्य संग्रह: * समझ के दायरे में o दायरे में सिमटती धूप o फिर वहीं से • चिंतन, व्यंग्य एवं अन्य: * दायरों की दुनिया, फिर भी रुकना ठीक नहीं, बस फुँकारते रहिये, समय की टुकड़ियाँ। o संपादन: "व्यंग्य-व्यंग्यकार और जो जरूरी है" एवं विभिन्न साझा संकलन। अकादमिक प्रभाव एवं शोध (Academic Milestones) • विश्वविद्यालय पाठ्यक्रम: उनकी मजदूरों के जीवन पर आधारित कविता "सड़क दर सड़क", स्वामी रामानंद तीर्थ मराठवाड़ा विश्वविद्यालय, नांदेड़ के बी.ए. (द्वितीय वर्ष) के पाठ्यक्रम का हिस्सा है। • Ph.D. शोध कार्य: उनके साहित्य पर गहन शोध किया गया है। "भुवनेश्वर उपाध्याय के साहित्य में व्यक्त जन जीवन" शीर्षक से शोधार्थी को डॉक्टरेट (Ph.D.) की उपाधि प्रदान की जा चुकी है। • समीक्षात्मक ग्रंथ: उनके कृतित्व पर केंद्रित पुस्तक “भुवनेश्वर उपाध्याय: समीक्षा के निकष पर" (संपादक– डॉ. मुदस्सिर सय्यद) प्रकाशित हो चुकी है। प्रमुख सम्मान • जयपुर साहित्य सम्मान (2022) – कृति: 'उलझन बुलझन प्यार' • मधुकर सृजन सम्मान (2018) – कृति: 'समझ के दायरे में'

Phir Wahi Se... is a collection of stories.

व्यंग्यात्मक शैली और सहज, सरल शब्दों के भाषाई तानेबाने से बुने उपन्यास “जुआगढ़” की कहानी हँसते, गुदगुदाते केवल ‘जुआ’ जैसे लगभग अनछुए विषय पर खुलकर प्रकाश ही नहीं डालती, बल्कि कस्बाई और ग्रामीण क्षेत्रों में पनपते इसके व्यवसायीकरण का विश्लेषणात्मक खाका भी खींचती है। जिसमें एक ओर जुआरियों के जीवन और उनके अंतरद्वंद्वों से जुड़े विभिन्न अनदेखे, अनसुने पहलू और उनसे जुड़े कठोर और निर्मम यथार्थ को “जुआगढ़” रेखांकित करता है तो दूसरी ओर आदमी की उस जंगली मानसिकता को भी उजागर करता है जो सिर्फ अपने बारे में सोचती है और इस एक हार-जीत के खेल को दूसरे के लिए पतन और मौत का सामान बना देती है। जीत की उम्मीद में पैसों को दाँव पर लगाते लगाते कब और कैसे इनकी पूरी दुनिया दाँव पर लग जाती है इन्हें खुद पता नहीं चलता...या फिर ये समझना ही नहीं चाहते!.

" एक कम सौ " उपन्यास की पृष्ठभूमि जिस प्रकार के ग्रामीण सामाजिक, पारिवारिक और आर्थिक परिवेश का प्रतिनिधित्व करती है, लेखक का अपनी भूमिका में " एक कम सौ की एक लम्बे वैचारिक मंथन से इसलिए और निकली क्योंकि मैं नहीं चाहता था कि मेरे पात्र अपने कर्मों के परिणाम को लेकर किसी मुगालते में रहें या अपना दोष किसी और के मत्थे मढ़कर, स्वयं पाक साफ बने रहें। जो हुआ वो न अनजाने में था और न अचानक! तब तो सोच समझकर किये कार्यों के परिणाम भोगने ही थे " ये कहना बहुत महत्वपूर्ण है। यहाँ लेखक अपनी प्रतिबद्धता दर्शाता है। इस उपन्यास के पात्र जैसे भी है; केवल स्वयं को जीते हैं। फिर भी तमाम नकारात्मकताओं के बाद भी लेखक दरकते रिश्तों और छीजती संवेदनाओं के बीच सकारात्मकता, सद्भाव और सुधार के विकल्प भी खोजकर सुझाता है। लेखक का आलोचना से जुड़ाव रचना में वैचारिक कसावट तो लाता ही है, साथ ही पाठकीय रुचि का ध्यान रखते हुए पठनीयता और संप्रेषणीयता को भी ऊंचाई प्रदान करता है, जो कृति की भाषा में झलकती है। उपन्यास का कथात्मक विस्तार कई छोटी-छोटी कहानियों, घटनाओं के माध्यम से सोच और चिंतन के नये द्वारा खोलता है। बुंदेलखंड की सांस्कृतिक और भाषाई महक इसे और रोचकता प्रदान करती है। एक तरफ अभाव और मन में पनपती असुरक्षा की भावना, दूसरी तरफ अहंकार! परिवार को कहाँ ले जाकर छोड़ता है...एक कम सौ, ऐसी जिंदगी के रेशे खोलकर उनके कारण खोजता है।इस कृति में मनोहरलाल जैसा विशुद्ध मानवीय कमजोरियों वाला मुख्य पात्र है तो वहीं उसकी पत्नी के रूप में शांति एक समभाव के साथ आदर्श जीवन के पक्ष में खड़ी रहती है। पटेल, पुजरी, नंबरदार, सरजूलाला, शंभू, रतन, द्वारका, घंसा, राधा, रामवती, करुणावती जैसे पात्र ग्रामीण परिवेश को जीवंत करने के साथ साथ कहानी को गति प्रदान करते हैं। इस कृति के अंत में लेखक कुछ प्रश्न छोड़ जाता है जैसे - मनोहरलाल की मृत्यु के बाद क्या उनका परिवार प्रेम और सद्भाव का पाठ पढ़ पाया या फिर इस विघटन का परिणाम उनकी आगामी पीढ़ियाँ भी भुगतेंगी? ' संस्कार बदलने में सौ साल लगते हैं।' ये कथन इसके दूसरे भाग का संकेत भी देता है। अभी कहना और बाकी है... लेखक में तमाम संभावनाओं के मद्देनजर डॉ. अवधबिहारी पाठक जैसे वरिष्ठ समीक्षक के द्वारा लेखक के लिए कहे गए इन शब्द का यहाँ उपयोग प्रासंगिक ही लगता है - " बौद्धिक चेतना का आत्मिक स्फुरण भुवनेश्वर उपाध्याय के चिंतन और मनन का मूल आधार है। प्राण तो सभी लेखकों में होते हैं, लेकिन लेखन के प्रति प्राणवत्ता जो यहाँ है कम ही देखी गई है। ”

‘‘पुस्तकें सत्ता नहीं स्वीकारतीं/तोड़ देतीं हैं सारे भ्रम जाल’’ सभी कविताऐं मुक्त छंद में हैं फिर भी उनमें एक लय है और कथन शैली की गमक भी । कवि ने प्रतीक भी अपने विचार दायरे से लिये हंै यथा जिंदगी को मंैने रोते हुये, बाप की खाँसी सुरसा के मुख सी, हो गईं इच्छाएँ र्इं/ान चूल्हे का, बेवसी की चादर, असत्य की लाशें, विवेक का पेड़ ये प्रतीक अनुभूति के नये बिम्ब रचने में समर्थ हैं । रचना की भाषा सरल है किसी विशेष भाषा बोली का आग्रह नहीं है । इसी से उर्दू शब्द भी सहज ही आ गये हैं और ठेठ देशज अलाव, तापना, अटपटी, पुलपुली, जैसे शब्द भी अपनी दस्तक देते हैं ।