शहर और मुखौटे
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हृदय रागिनी (Hridaya Ragini)
प्रेम एक शाश्वत अनुभूति है, एक ऐसा भाव जो सृष्टि के कण-कण में व्याप्त है और मानवीय संवेदनाओं का सबसे मधुर, सबसे गहन पहलू भी। यह हृदय की वो रागिनी है जो कभी हौले से गुनगुनाती है, तो कभी भावनाओं के सागर में ज्वार बन उठती है। "हृदय रागिनी" इसी अनुभूति के विभिन्न सुरों को शब्दों में पिरोने का एक विनम्र प्रयास है। इस संग्रह की 100 कविताएँ प्रेम के उस सफर पर ले जाती हैं जहाँ पहला आकर्षण, अनुराग का अंकुरण, प्रीति का गहरा सागर, विरह की वेदना, मिलन की आस, प्रेम का स्थायी बसेरा और अंततः प्रेम के दर्शन और उसकी शाश्वतता के विभिन्न पड़ाव आते हैं। प्रत्येक कविता हृदय के किसी कोने से निकली एक रागिनी है – जो कभी मीठी, कभी दर्द भरी, कभी उम्मीद से रोशन, तो कभी समर्पण में डूबी हुई है। इस संग्रह का उद्देश्य प्रेम के बहुरंगी स्वरूप को उसकी संपूर्णता में चित्रित करना है, चाहे वह नव-अनुराग की चंचलता हो या परिपक्व प्रेम का ठहराव, विरह की टीस हो या मिलन का उल्लास। यहाँ कुछ कविताएँ पारंपरिक छंदों में हैं तो कुछ मुक्त छंद की स्वच्छंदता लिए हुए, ताकि भावों को उनकी स्वाभाविक लय मिल सके। यह संग्रह उन सभी पाठकों के लिए है जिन्होंने कभी प्रेम को महसूस किया है, उसकी राह देखी है, या उसकी गहराई में डूबना चाहा है। आशा है कि ये कविताएँ आपके हृदय के तारों को झंकृत करेंगी और आपको अपने प्रेम की अनुभूतियों से कहीं न कहीं जोड़ पाएंगी, आपको अपने मन की रागिनी सुना पाएंगी। प्रेम की इस अनंत यात्रा में, "हृदय रागिनी" आपका स्वागत करती है।

Dashanan Digvijayam
महापराक्रमी, प्रकांड विद्वान, शिव-भक्त लंकाधिपति रावण – एक ऐसा चरित्र जो शक्ति और ज्ञान के शिखर पर आसीन होकर भी अपने अहंकार की अग्नि में भस्म हो गया। "दशानन दिग्विजयम्" उसी दशमुख की महत्वाकांक्षाओं, विजयों, प्रेम, घृणा, अधर्म-प्रवृत्ति और अंततः उसके त्रासद पतन की एक ऐसी महागाथा है जो युगों से अनुत्तरित प्रश्नों को एक नवीन काव्यात्मक दृष्टि से प्रस्तुत करती है। यह महाकाव्य रावण के जीवन के उन अनछुए पहलुओं को उद्घाटित करता है जहाँ उसका ज्ञान उसके अहंकार से जूझता है, जहाँ उसकी शक्ति उसके विवेक पर हावी हो जाती है, और जहाँ उसका पतन एक शाश्वत संदेश बन जाता है। आठ सर्गों में विभक्त यह रचना, सहज काव्यात्मक शैली में, रावण के जटिल व्यक्तित्व और उसकी विरासत का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करती है। एक पौराणिक प्रतिनायक की यह अंतर्कथा न केवल अतीत का दर्पण है, बल्कि वर्तमान के लिए एक चेतावनी भी।

राधेय: विधि-वंचित वीर की अमर कहानी
"राधेय: विधि-वंचित वीर की अमर कहानी"" महाभारत के सर्वाधिक तेजस्वी और त्रासद महानायक कर्ण के जीवन का एक महाकाव्यात्मक आख्यान है। सूर्यपुत्र तथा कुंती के ज्येष्ठ पुत्र होने के बावजूद, जन्म के साथ ही परित्यक्त कर्ण का पालन-पोषण सूत अधिरथ और राधा ने किया, जिससे वे 'राधेय' कहलाए। नैसर्गिक कवच-कुंडल से युक्त कर्ण ने आजीवन सामाजिक उपेक्षा और कुल-हीनता के दंश सहे, किंतु अपने अदम्य साहस, अतुलनीय शौर्य और असाधारण दानवीरता से उन्होंने अपनी एक अलग पहचान बनाई। गुरु परशुराम से शस्त्र-शिक्षा और शाप, दुर्योधन से अटूट मित्रता (जो उन्हें कई बार धर्म-संकट में डालती), द्यूत-पर्व में उनकी विवादास्पद भूमिका, युद्ध-पूर्व माता कुंती द्वारा सत्य का उद्घाटन और इंद्र द्वारा कवच-कुंडल का छलपूर्वक हरण उनके जीवन के निर्णायक मोड़ थे। कुरुक्षेत्र महासमर में अपने अद्भुत पराक्रम और सेनापतित्व से उन्होंने पांडव-सेना में त्राहि मचा दी। अर्जुन के साथ उनका अंतिम, महाप्रलयंकारी द्वंद्व और शापों तथा विधि के विधान के चलते उनकी वीरगति, महाभारत की सबसे मार्मिक घटनाओं में से एक है। मृत्यु उपरांत उनके वास्तविक जन्म का सत्य सम्पूर्ण विश्व के समक्ष प्रकट होता है, जिससे पांडवों में घोर पश्चाताप उत्पन्न होता है। अंततः, स्वर्ग में उन्हें अपने यथोचित दिव्य स्थान और सम्मान की प्राप्ति होती है। यह गाथा कर्ण के अनवरत संघर्ष, उनकी अटूट निष्ठा, उनके अतुल्य त्याग और एक विधि-वंचित वीर की अमर कीर्ति का चित्रण है।

ख़ामख़ाँ (Hindi Edition)
“ख़ामख़ाँ” एक तीखा, ईमानदार और बेबाक ग़ज़ल-संग्रह है, जो इश्क़ के टूटने, तन्हाई की वहशत, और ज़िंदगी की बेमानी पर सवाल उठाता है। इन ग़ज़लों में मोहब्बत किसी ख्वाब की तरह नहीं, बल्कि एक थकाऊ सच्चाई की तरह सामने आती है—जहाँ वादे झूठे हैं, तसल्ली बनावटी है, और इंसान अपने ही सवालों में घिरा हुआ है। यह किताब दिल बहलाने के लिए नहीं लिखी गई। यह उन पाठकों के लिए है जो शायरी में सच्चाई, कड़वाहट, व्यंग्य और आत्म-संघर्ष को पहचानते हैं। “ख़ामख़ाँ” उन आवाज़ों की किताब है, जो अक्सर दबा दी जाती हैं—लेकिन चुप नहीं होतीं।

काग़ज़ की नाव
1996